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फिल्मों में बढ़ता खून-खराबा: कितना सही, कितना गलत ? और बच्चों पर इसका असर

20 Mar 2026, 04:25 PM

फिल्मों में बढ़ता खून-खराबा: आज के दौर में मनोरंजन के साधन तेजी से बदल रहे हैं। पहले जहां परिवार के साथ बैठकर साफ-सुथरी फिल्में देखी जाती थीं, वहीं अब फिल्मों और वेब सीरीज में हिंसा, खून-खराबा और क्रूरता का स्तर काफी हद बढ़ गया है। बड़े पर्दे से लेकर ओटीटी प्लेटफॉर्म तक, एक्शन और थ्रिल के नाम पर हिंसा को जिस तरह से दिखाया जा रहा है, उसने समाज में एक नई बहस को जन्म दिया है — क्या यह सही है ? और इसका बच्चों पर क्या असर पड़ रहा है ?

क्यों बढ़ रहा है फिल्मों में हिंसा का चलन ?

फिल्म इंडस्ट्री हमेशा दर्शकों की पसंद के अनुसार खुद को ढालती है। आज के समय में “रियलिस्टिक कंटेंट” के नाम पर हिंसा को ज्यादा दिखाया जा रहा है।

मुख्य कारण :

दर्शकों को “थ्रिल” और “एक्शन” ज्यादा पसंद आना

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर सेंसरशिप का कम होना

प्रतिस्पर्धा के चलते अधिक “शॉक वैल्यू” दिखाने की कोशिश

हॉलीवुड और इंटरनेशनल कंटेंट का प्रभाव

फिल्म निर्माता मानते हैं कि हिंसा से कहानी ज्यादा प्रभावशाली और आकर्षक बनती है, लेकिन यह सोच पूरी तरह सही नहीं मानी जा सकती।

क्या फिल्मों में हिंसा दिखाना गलत है ?

यह सवाल सीधा नहीं है। पूरी तरह से “गलत” या “सही” कहना मुश्किल है।

जहां यह सही हो सकता है :

अगर कहानी की मांग हो (जैसे युद्ध, अपराध या ऐतिहासिक घटनाएं)

सामाजिक मुद्दों को उजागर करने के लिए

दर्शकों को सच्चाई दिखाने के लिए

जहां यह गलत हो जाता है :

जब हिंसा को ग्लोरिफाई किया जाता है

बिना किसी संदेश के सिर्फ मनोरंजन के लिए खून-खराबा दिखाया जाए

बच्चों और युवाओं को प्रभावित करने वाले तरीके से प्रस्तुत किया जाए

समस्या तब शुरू होती है जब हिंसा को “कूल” या “हीरोइक” दिखाया जाता है।

बच्चों पर इसका क्या असर पड़ता है ?

बच्चों का दिमाग बहुत संवेदनशील होता है। वे जो देखते हैं, उसे जल्दी सीखते और अपनाते हैं।

आक्रामक व्यवहार में वृद्धि

बार-बार हिंसक दृश्य देखने से बच्चे आक्रामक हो सकते हैं। वे छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा दिखाने लगते हैं।

संवेदनशीलता में कमी

खून-खराबा देखने से बच्चों के मन में डर कम और कठोरता ज्यादा आ सकती है। उन्हें दूसरों के दर्द का एहसास कम होने लगता है।

हिंसा को सामान्य मान लेना

जब बच्चे बार-बार हिंसा देखते हैं, तो उन्हें लगता है कि यह सामान्य चीज है। इससे वे गलत और सही में फर्क नहीं कर पाते।

नकल करने की प्रवृत्ति

बच्चे अक्सर फिल्मों के हीरो की नकल करते हैं। अगर हीरो हिंसा करता है, तो बच्चे भी वैसा ही करने की कोशिश कर सकते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य पर असर

डरावने और हिंसक दृश्य बच्चों में डर, चिंता और तनाव पैदा कर सकते हैं। कुछ बच्चों को बुरे सपने भी आने लगते हैं।

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने बढ़ाई चिंता

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स (जैसे Netflix, Amazon Prime, etc.) पर कंटेंट आसानी से उपलब्ध है और सेंसरशिप भी सीमित है।

बच्चे बिना रोक-टोक हिंसक कंटेंट देख लेते हैं

पैरेंटल कंट्रोल का इस्तेमाल कम होता है

कंटेंट की भाषा और दृश्य दोनों ही ज्यादा बोल्ड होते हैं

इससे बच्चों पर प्रभाव और भी ज्यादा तेजी से पड़ रहा है।

माता-पिता की जिम्मेदारी

इस स्थिति में सबसे बड़ी भूमिका माता-पिता की होती है।

क्या करें ?

बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित करें

उन्हें उम्र के अनुसार ही कंटेंट दिखाएं

पैरेंटल कंट्रोल का इस्तेमाल करें

बच्चों से बातचीत करें कि क्या सही है और क्या गलत

खुद भी जिम्मेदार कंटेंट देखें

बच्चों को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन सही मार्गदर्शन देना बेहद जरूरी है।

फिल्म इंडस्ट्री की जिम्मेदारी

फिल्म निर्माताओं को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए।

हिंसा को ग्लोरिफाई न करें

समाज पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखें

सर्टिफिकेशन सिस्टम का सही पालन करें

सकारात्मक संदेश देने वाली फिल्मों को बढ़ावा दें

मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

संतुलन ही समाधान है

हर चीज की तरह फिल्मों में भी संतुलन जरूरी है। पूरी तरह से हिंसा को खत्म करना संभव नहीं है, लेकिन उसका सही और सीमित उपयोग जरूरी है।

निष्कर्ष

फिल्मों में बढ़ता खून-खराबा एक गंभीर मुद्दा बनता जा रहा है। जहां एक ओर यह मनोरंजन का हिस्सा है, वहीं दूसरी ओर इसका समाज, खासकर बच्चों पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है।

जरूरत है समझदारी की —

दर्शकों को भी जागरूक होना होगा

माता-पिता को बच्चों का मार्गदर्शन करना होगा

और फिल्म इंडस्ट्री को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी

अगर हम समय रहते इस पर ध्यान नहीं देंगे, तो आने वाली पीढ़ी के व्यवहार और सोच पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है।

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